हार  से जीत की ओर

हार से जीत की ओर

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कुछ  दिन पहले  मेरी मुलकात एक २६ वर्षीय  युवक से  हुई | उसकी झुकी हुई नजरे गिरे हुए कंधे और हिचकिचाहट  बात करे का ढंग  उसके अंदर चल रही गड़बड़ी  की ओर संकेत दे रही थी  ज्यादा  वक्त  नहीं लगा और उसने सारी  बाटे कह दी | वह काने लगा में किसी काम के लायक नहीं हु  ग्रेजुएशन  (Graduation) के बाद में ने पिछ्ले  पांच  सालो  में कई  काम बदला कर देख लिया।,पर कही टिक नहीं पाया | अब मेरे पिता जी भी नहीं रहे | घर पे सब मेरे पर आसरा रखते है  और सोचते  है की में जिम्मेदार हु | उन्हें नहीं पता की में झूट के  सहारे ही बचता आया हु और में में उनको धोखा दे रहा हु | अब में आत्मविशवास  खो चूका हु | हार गया हु और जीना नहीं  चाहता |"उसकी दर्द  भरी कहनी  इस प्रकार चलती रही  
ऐसी आपबितोया ढूंढनी नहीं पड़ती  है | दुनिया के तीब्र  गति से कदम न मिला  पाने के कारण  हारकर आज हजारो  लोग हमरे चारो ओर  निराश के अंधकार में दुबे हुए है पर हार  से कोण नहीं डरता हार  के दर से कई बार काम शुरू करने से पहले ही दर जाते है परन्तु  जीवन  में सभी को हर के सामना कभी न कभी करना  पड़ता है पराजय हमें बहुत कुछ  सीखा जाती है और जित के लिए तैयार  कर  सकती है और  लगातार हम  हारते ही रह गए  तो निराश हो कर ऐसी हालत में फस जायेगे जहा से उभर आना मुश्किल है इस तरह हमते किते भाई  लोग आसा खो कर अंधकार में जीवन बिता रहे है जो अपने अस्तित तक की भूल चुके है जो अपने आप को दुनिया में भोझ समझते है जीने ऐसा लगता है की उनका इस  दिनिया में कोई नहीं है और अपने से पूछते रहते है


"आखिर मुझे कोई क्यों नहीं समझ  प् रहा है ?"

अंत  में ऐसे लोग का एक ही निकास दीखता है -किसी तरह जीवन को ही खरतम कर दिया जाये | 

आज हम ऐसी जीवन शैली अपना ली है जेसे प्रभु -परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं है | सायद एहि कराड  है जो परेशानिया का जड़ है जिसने हमें बनाया  उसी को ही आज हम ने अपने दरवाजे से बाहर कर दिया है | परमेश्वर के स्थान पर हम ने सांसारिक वस्तुओ  और अपनी भावनाओ को आज अपना  भगवन बना लिए है | 

आज हम पैसो  की ेशो -आराम की और सुख -चेन की उपासना करते  है आज हम मनुष्य को को परमेश्वर का स्थान दे दिया है 
और सब खुछ अपना ताकत से करना कहते है सायद ऐसी का नतीजा हम भुगत भी रहे है 

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